Sai Baba Vrat Katha in Hindiसाईं बाबा व्रत कथा

Below is the complete Sai Baba Nav Guruvar Vrat Katha in Hindi, the story of Kokila that devotees read at every Thursday puja; for the same story in English, see the English katha.

कोकिला बहन और महेशभाई

एक शहर में कोकिला नाम की एक स्त्री अपने पति महेशभाई के साथ रहती थी। पति-पत्नी में आपस में बहुत प्रेम था और दोनों सुख-दुख में एक-दूसरे का साथ निभाते थे। पर महेशभाई का स्वभाव बड़ा झगड़ालू था। बात-बात पर उन्हें गुस्सा आ जाता और वे बिना सोचे-समझे कड़वे बोल बोल देते। उनकी बोली इतनी कठोर थी कि आसपास के पड़ोसी भी उनसे परेशान रहते थे। कोई उनसे बात करने आता तो दो बातों में ही झगड़ा हो जाता, इसलिए धीरे-धीरे लोग उनके घर आने से कतराने लगे।

कोकिला बहन इसके बिलकुल उलट थीं। वे धार्मिक, शांत और सहनशील स्वभाव की थीं। सुबह-शाम भगवान का नाम लेतीं, घर का हर काम मन लगाकर करतीं और पति के कठोर शब्दों को भी चुपचाप सह लेतीं। वे कभी पलटकर जवाब नहीं देतीं। उनके मन में भगवान पर अटूट विश्वास था और वे सोचती थीं कि जिस प्रभु ने यह जीवन दिया है, वही एक दिन सब ठीक भी करेगा।

घर पर छाए दुख के बादल

समय बीतने के साथ महेशभाई का धंधा धीरे-धीरे मंदा पड़ने लगा। ग्राहक कम होते गए, कमाई घटती गई और एक दिन ऐसा आया कि काम लगभग ठप हो गया। अब महेशभाई सारा दिन घर पर ही बैठे रहते। काम न होने की चिंता ने उनके स्वभाव को और भी चिड़चिड़ा बना दिया। छोटी-छोटी बातों पर वे कोकिला बहन पर बरस पड़ते और घर का वातावरण हर समय तनाव से भरा रहने लगा।

घर में पैसों की तंगी हो गई। कई बार तो घर का खर्च चलाना भी कठिन हो जाता। जो घर कभी हँसी से भरा रहता था, वहाँ अब उदासी छा गई थी। फिर भी कोकिला बहन ने धीरज नहीं छोड़ा। वे घर का काम निपटाकर भगवान के सामने बैठ जातीं और मन ही मन प्रार्थना करतीं: "हे प्रभु, मेरे पति का मन शांत कर दो, उनका काम फिर से चला दो और हमारे घर में सुख-शांति लौटा दो।"

द्वार पर आए एक बाबा

एक दिन दोपहर के समय कोकिला बहन के दरवाज़े पर एक वृद्ध बाबा आए। उनके वस्त्र साधारण थे, पर चेहरे पर अद्भुत तेज था और आँखों में करुणा झलक रही थी। उन्होंने कोमल स्वर में कहा, "बेटी, भूख लगी है। थोड़ी दाल-चावल मिलेगी?"

घर में बहुत कुछ नहीं था, फिर भी कोकिला बहन ने आदर से बाबा को प्रणाम किया, उन्हें बैठाया और जो दाल-चावल बने थे, प्रेम से परोस दिए। भोजन पाकर बाबा प्रसन्न हुए और आशीर्वाद देते हुए बोले, "बेटी, साईं तुझे सुखी रखेंगे।"

यह सुनकर कोकिला बहन की आँखें भर आईं। वे बोलीं, "बाबा, मेरे भाग्य में सुख कहाँ है?" और उन्होंने अपने मन का सारा दुख बाबा को कह सुनाया: पति का गुस्सैल स्वभाव, पड़ोसियों की नाराज़गी, ठप पड़ा धंधा और घर की तंगी।

बाबा ने शांति से सब सुना और मुस्कराकर बोले, "बेटी, चिंता मत कर। तू श्री साईं बाबा के नौ गुरुवार का व्रत कर। श्रद्धा और सबुरी से किया गया यह व्रत मन को शांति देता है। साईं बाबा अपने भक्त की सच्ची पुकार कभी अनसुनी नहीं करते।"

बाबा ने बताई व्रत की विधि

कोकिला बहन ने हाथ जोड़कर पूछा, "बाबा, यह व्रत कैसे किया जाता है?" तब बाबा ने उन्हें प्रेम से पूरी विधि समझाई:

  1. यह व्रत लगातार नौ गुरुवार तक किया जाता है। किसी भी गुरुवार को साईं बाबा का नाम लेकर इसे शुरू किया जा सकता है। इसे स्त्री, पुरुष, बच्चे, कोई भी कर सकता है।
  2. व्रत के दिन फलाहार करके, या दूध, चाय, फलों का रस जैसा तरल लेकर, या दिन में एक बार (सुबह या शाम) भोजन करके व्रत रखा जा सकता है। बिलकुल भूखे रहकर व्रत नहीं करना चाहिए।
  3. सुबह या शाम को एक साफ चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर साईं बाबा का फोटो रखें। फोटो को साफ पानी और साफ कपड़े से पोंछें, चंदन या कुमकुम का तिलक लगाएँ और पीले फूल या माला चढ़ाएँ।
  4. धूप और घी का दीपक जलाकर साईं बाबा को प्रसाद चढ़ाएँ। प्रसाद में कोई भी मिठाई, फल या खिचड़ी, जो भी अपनी सामर्थ्य हो, रखा जा सकता है।
  5. फिर साईं व्रत की कथा पढ़ें, साईं बाबा का नाम स्मरण करें, आरती करें और प्रसाद सबको बाँटें।
  6. हो सके तो व्रत के दिन साईं बाबा के मंदिर जाकर दर्शन करें।
  7. नौवें गुरुवार को उद्यापन करें: पाँच गरीबों को भोजन कराएँ और साईं बाबा के व्रत की पुस्तकें पाँच, ग्यारह या इक्कीस लोगों को भेंट करें, ताकि यह व्रत और भी घरों तक पहुँचे।

इतना कहकर बाबा ने कोकिला बहन को आशीर्वाद दिया और चले गए। कोकिला बहन उन्हें विदा करने द्वार तक गईं, पर देखते ही देखते बाबा न जाने कहाँ ओझल हो गए। कोकिला बहन के मन में एक अनोखी शांति भर गई और उन्होंने उसी क्षण निश्चय कर लिया कि वे यह व्रत अवश्य करेंगी।

श्रद्धा का फल

अगले गुरुवार को कोकिला बहन ने साईं बाबा का नाम लेकर व्रत का संकल्प किया। उन्होंने बाबा की बताई विधि से फोटो सजाया, पीले फूल चढ़ाए, दीपक जलाया, कथा पढ़ी और आरती करके प्रसाद बाँटा। दिन भर वे मन ही मन "ॐ साईं राम" का जाप करती रहीं।

पहले ही गुरुवार को घर का वातावरण कुछ बदला हुआ लगा। उस दिन महेशभाई ने किसी बात पर झगड़ा नहीं किया। कोकिला बहन को लगा कि यह साईं बाबा की कृपा है, और उनकी श्रद्धा और भी बढ़ गई। वे हर गुरुवार इसी प्रेम और नियम से व्रत करती रहीं।

गुरुवार पर गुरुवार बीतते गए और महेशभाई का स्वभाव धीरे-धीरे बदलने लगा। उनकी बोली में नरमी आ गई, वे पड़ोसियों से भी प्रेम से बोलने लगे और घर में बात-बात पर होने वाला क्लेश बंद हो गया। कुछ ही समय में उनका धंधा भी फिर से चल पड़ा। ग्राहक लौट आए, कमाई बढ़ने लगी और घर की तंगी दूर हो गई। जो घर कभी तनाव से भरा रहता था, वहाँ फिर से हँसी और सुख-शांति लौट आई।

नौवें गुरुवार को कोकिला बहन ने बाबा के कहे अनुसार श्रद्धा से उद्यापन किया। उन्होंने पाँच गरीबों को आदर से भोजन कराया और साईं व्रत की पुस्तकें अपने रिश्तेदारों और पड़ोसियों को भेंट कीं। पति-पत्नी दोनों ने साईं बाबा के सामने सिर झुकाकर उनका धन्यवाद किया।

सूरत से आए जेठ-जेठानी

कुछ दिनों बाद सूरत से कोकिला बहन के जेठ और जेठानी उनके घर आए। बातों-बातों में जेठानी ने दुखी मन से बताया, "हमारे बच्चे पढ़ाई में बिलकुल मन नहीं लगाते। कितना भी समझाओ, किताब हाथ में नहीं लेते। इस बार तो वे परीक्षा में फेल भी हो गए।"

कोकिला बहन ने उन्हें प्रेम से साईं बाबा के नौ गुरुवार के व्रत के बारे में बताया और अपने घर का पूरा अनुभव सुनाया। उन्होंने जेठानी को साईं व्रत की एक पुस्तक भी भेंट की और कहा, "भाभी, आप भी श्रद्धा और सबुरी से यह व्रत कीजिए। साईं बाबा पर भरोसा रखिए।"

सूरत लौटकर जेठ-जेठानी ने पूरे विधि-विधान से व्रत किया। कुछ समय बाद उनका पत्र आया। उसमें लिखा था कि बच्चों का मन अब पढ़ाई में लगने लगा है, वे रोज़ मन लगाकर पढ़ते हैं और इस बार परीक्षा में अच्छे अंकों से पास हुए हैं। उन्होंने यह भी लिखा कि उन्होंने व्रत की पुस्तकें अपने परिचितों को भी बाँटी हैं, ताकि और लोग भी इस व्रत के बारे में जान सकें।

और भी भक्तों के अनुभव

पुस्तिका में ऐसे और भी अनुभव बताए गए हैं। कहीं किसी सखी की बेटी के विवाह की बात बहुत समय से अटकी हुई थी, तो कहीं किसी परिवार में लंबे समय से बीमारी के कारण चिंता बनी हुई थी। कथा बताती है कि उन्होंने भी श्रद्धा से साईं बाबा का नौ गुरुवार का व्रत किया और उनके मन को धीरज मिला, उनकी कठिनाइयाँ धीरे-धीरे हल्की हुईं। भक्तों का विश्वास है कि जो सच्चे मन से साईं बाबा को पुकारता है, बाबा उसे कभी अकेला नहीं छोड़ते।

साईं बाबा ने अपने भक्तों को श्रद्धा और सबुरी का पाठ पढ़ाया। श्रद्धा यानी अटूट विश्वास और सबुरी यानी धैर्य। कोकिला बहन ने इन्हीं दोनों के सहारे व्रत किया और कठिन समय में भी आशा का दीपक बुझने नहीं दिया।

कथा का समापन

हे साईं बाबा, जैसे आपने कोकिला बहन और उनके परिवार पर कृपा की, उनके घर में शांति और सुख लौटाया, वैसे ही इस कथा को पढ़ने और सुनने वाले सभी भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखना। सबके मन में श्रद्धा और सबुरी देना, सबके घर में प्रेम और सद्भाव बनाए रखना।

बोलो श्री सच्चिदानंद सद्गुरु साईंनाथ महाराज की जय!

How to read the katha during the puja

The katha is the heart of the Thursday puja. It is read after the photo of Sai Baba has been set up and worshipped, and before the aarti. The full sequence of the puja is explained on the Sai Baba vrat vidhi page; the points below cover the katha itself. Customs vary between families, so follow your own tradition where it differs.

  1. Before you begin, light the ghee lamp and incense, offer yellow flowers and a chandan or kumkum tilak, and bow to Sai Baba.
  2. Many devotees hold a few grains of akshat (unbroken rice) and a flower in their folded hands while reading or listening, and offer them at Baba's feet at the end.
  3. Read slowly and clearly, aloud if family members are listening, or softly in a calm voice if you are alone.
  4. Try not to get up or talk in between; keep your mind on the story and on Baba.
  5. Read in the language you understand best. The same story is available as the Sai Baba vrat katha in English.
  6. After the katha, chant a simple mantra such as ॐ साईं राम or ॐ श्री साईं नाथाय नमः, then sing the Sai Baba aarti.
  7. Offer the prasad and share it with everyone present, as Baba loved to see people fed.

On the ninth Thursday the katha is read in the same way, and then the poor are fed and copies of the vrat book are given away as part of the udyapan vidhi.

Closing prayer

After the aarti, many devotees end the puja with a short prayer in their own words, thanking Baba and asking forgiveness for any mistake made during the worship. A simple prayer in Hindi could be:

हे साईं बाबा, मैंने अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार आपकी पूजा की है।
पूजा में जाने-अनजाने जो भूल हुई हो, उसे क्षमा करना।
मेरे मन में श्रद्धा और सबुरी बनाए रखना।
जैसे आपने कोकिला बहन पर कृपा की, वैसे ही सब भक्तों पर कृपा करना।
बोलो श्री सच्चिदानंद सद्गुरु साईंनाथ महाराज की जय।

Meaning: O Sai Baba, I have worshipped you as far as my faith and means allow. Please forgive any mistake made in this puja, knowingly or unknowingly. Keep faith and patience alive in my heart. As you showed grace to Kokila, show grace to all your devotees. Victory to Shri Sachchidanand Sadguru Sainath Maharaj.

You may pray in English or in any language you are comfortable with; the feeling behind the words matters more than the exact wording.

कोकिला बहन और महेशभाई

एक शहर में कोकिला नाम की एक स्त्री अपने पति महेशभाई के साथ रहती थी। पति-पत्नी में आपस में बहुत प्रेम था और दोनों सुख-दुख में एक-दूसरे का साथ निभाते थे। पर महेशभाई का स्वभाव बड़ा झगड़ालू था। बात-बात पर उन्हें गुस्सा आ जाता और वे बिना सोचे-समझे कड़वे बोल बोल देते। उनकी बोली इतनी कठोर थी कि आसपास के पड़ोसी भी उनसे परेशान रहते थे। कोई उनसे बात करने आता तो दो बातों में ही झगड़ा हो जाता, इसलिए धीरे-धीरे लोग उनके घर आने से कतराने लगे।

कोकिला बहन इसके बिलकुल उलट थीं। वे धार्मिक, शांत और सहनशील स्वभाव की थीं। सुबह-शाम भगवान का नाम लेतीं, घर का हर काम मन लगाकर करतीं और पति के कठोर शब्दों को भी चुपचाप सह लेतीं। वे कभी पलटकर जवाब नहीं देतीं। उनके मन में भगवान पर अटूट विश्वास था और वे सोचती थीं कि जिस प्रभु ने यह जीवन दिया है, वही एक दिन सब ठीक भी करेगा।

घर पर छाए दुख के बादल

समय बीतने के साथ महेशभाई का धंधा धीरे-धीरे मंदा पड़ने लगा। ग्राहक कम होते गए, कमाई घटती गई और एक दिन ऐसा आया कि काम लगभग ठप हो गया। अब महेशभाई सारा दिन घर पर ही बैठे रहते। काम न होने की चिंता ने उनके स्वभाव को और भी चिड़चिड़ा बना दिया। छोटी-छोटी बातों पर वे कोकिला बहन पर बरस पड़ते और घर का वातावरण हर समय तनाव से भरा रहने लगा।

घर में पैसों की तंगी हो गई। कई बार तो घर का खर्च चलाना भी कठिन हो जाता। जो घर कभी हँसी से भरा रहता था, वहाँ अब उदासी छा गई थी। फिर भी कोकिला बहन ने धीरज नहीं छोड़ा। वे घर का काम निपटाकर भगवान के सामने बैठ जातीं और मन ही मन प्रार्थना करतीं: "हे प्रभु, मेरे पति का मन शांत कर दो, उनका काम फिर से चला दो और हमारे घर में सुख-शांति लौटा दो।"

द्वार पर आए एक बाबा

एक दिन दोपहर के समय कोकिला बहन के दरवाज़े पर एक वृद्ध बाबा आए। उनके वस्त्र साधारण थे, पर चेहरे पर अद्भुत तेज था और आँखों में करुणा झलक रही थी। उन्होंने कोमल स्वर में कहा, "बेटी, भूख लगी है। थोड़ी दाल-चावल मिलेगी?"

घर में बहुत कुछ नहीं था, फिर भी कोकिला बहन ने आदर से बाबा को प्रणाम किया, उन्हें बैठाया और जो दाल-चावल बने थे, प्रेम से परोस दिए। भोजन पाकर बाबा प्रसन्न हुए और आशीर्वाद देते हुए बोले, "बेटी, साईं तुझे सुखी रखेंगे।"

यह सुनकर कोकिला बहन की आँखें भर आईं। वे बोलीं, "बाबा, मेरे भाग्य में सुख कहाँ है?" और उन्होंने अपने मन का सारा दुख बाबा को कह सुनाया: पति का गुस्सैल स्वभाव, पड़ोसियों की नाराज़गी, ठप पड़ा धंधा और घर की तंगी।

बाबा ने शांति से सब सुना और मुस्कराकर बोले, "बेटी, चिंता मत कर। तू श्री साईं बाबा के नौ गुरुवार का व्रत कर। श्रद्धा और सबुरी से किया गया यह व्रत मन को शांति देता है। साईं बाबा अपने भक्त की सच्ची पुकार कभी अनसुनी नहीं करते।"

बाबा ने बताई व्रत की विधि

कोकिला बहन ने हाथ जोड़कर पूछा, "बाबा, यह व्रत कैसे किया जाता है?" तब बाबा ने उन्हें प्रेम से पूरी विधि समझाई:

  1. यह व्रत लगातार नौ गुरुवार तक किया जाता है। किसी भी गुरुवार को साईं बाबा का नाम लेकर इसे शुरू किया जा सकता है। इसे स्त्री, पुरुष, बच्चे, कोई भी कर सकता है।
  2. व्रत के दिन फलाहार करके, या दूध, चाय, फलों का रस जैसा तरल लेकर, या दिन में एक बार (सुबह या शाम) भोजन करके व्रत रखा जा सकता है। बिलकुल भूखे रहकर व्रत नहीं करना चाहिए।
  3. सुबह या शाम को एक साफ चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर साईं बाबा का फोटो रखें। फोटो को साफ पानी और साफ कपड़े से पोंछें, चंदन या कुमकुम का तिलक लगाएँ और पीले फूल या माला चढ़ाएँ।
  4. धूप और घी का दीपक जलाकर साईं बाबा को प्रसाद चढ़ाएँ। प्रसाद में कोई भी मिठाई, फल या खिचड़ी, जो भी अपनी सामर्थ्य हो, रखा जा सकता है।
  5. फिर साईं व्रत की कथा पढ़ें, साईं बाबा का नाम स्मरण करें, आरती करें और प्रसाद सबको बाँटें।
  6. हो सके तो व्रत के दिन साईं बाबा के मंदिर जाकर दर्शन करें।
  7. नौवें गुरुवार को उद्यापन करें: पाँच गरीबों को भोजन कराएँ और साईं बाबा के व्रत की पुस्तकें पाँच, ग्यारह या इक्कीस लोगों को भेंट करें, ताकि यह व्रत और भी घरों तक पहुँचे।

इतना कहकर बाबा ने कोकिला बहन को आशीर्वाद दिया और चले गए। कोकिला बहन उन्हें विदा करने द्वार तक गईं, पर देखते ही देखते बाबा न जाने कहाँ ओझल हो गए। कोकिला बहन के मन में एक अनोखी शांति भर गई और उन्होंने उसी क्षण निश्चय कर लिया कि वे यह व्रत अवश्य करेंगी।

श्रद्धा का फल

अगले गुरुवार को कोकिला बहन ने साईं बाबा का नाम लेकर व्रत का संकल्प किया। उन्होंने बाबा की बताई विधि से फोटो सजाया, पीले फूल चढ़ाए, दीपक जलाया, कथा पढ़ी और आरती करके प्रसाद बाँटा। दिन भर वे मन ही मन "ॐ साईं राम" का जाप करती रहीं।

पहले ही गुरुवार को घर का वातावरण कुछ बदला हुआ लगा। उस दिन महेशभाई ने किसी बात पर झगड़ा नहीं किया। कोकिला बहन को लगा कि यह साईं बाबा की कृपा है, और उनकी श्रद्धा और भी बढ़ गई। वे हर गुरुवार इसी प्रेम और नियम से व्रत करती रहीं।

गुरुवार पर गुरुवार बीतते गए और महेशभाई का स्वभाव धीरे-धीरे बदलने लगा। उनकी बोली में नरमी आ गई, वे पड़ोसियों से भी प्रेम से बोलने लगे और घर में बात-बात पर होने वाला क्लेश बंद हो गया। कुछ ही समय में उनका धंधा भी फिर से चल पड़ा। ग्राहक लौट आए, कमाई बढ़ने लगी और घर की तंगी दूर हो गई। जो घर कभी तनाव से भरा रहता था, वहाँ फिर से हँसी और सुख-शांति लौट आई।

नौवें गुरुवार को कोकिला बहन ने बाबा के कहे अनुसार श्रद्धा से उद्यापन किया। उन्होंने पाँच गरीबों को आदर से भोजन कराया और साईं व्रत की पुस्तकें अपने रिश्तेदारों और पड़ोसियों को भेंट कीं। पति-पत्नी दोनों ने साईं बाबा के सामने सिर झुकाकर उनका धन्यवाद किया।

सूरत से आए जेठ-जेठानी

कुछ दिनों बाद सूरत से कोकिला बहन के जेठ और जेठानी उनके घर आए। बातों-बातों में जेठानी ने दुखी मन से बताया, "हमारे बच्चे पढ़ाई में बिलकुल मन नहीं लगाते। कितना भी समझाओ, किताब हाथ में नहीं लेते। इस बार तो वे परीक्षा में फेल भी हो गए।"

कोकिला बहन ने उन्हें प्रेम से साईं बाबा के नौ गुरुवार के व्रत के बारे में बताया और अपने घर का पूरा अनुभव सुनाया। उन्होंने जेठानी को साईं व्रत की एक पुस्तक भी भेंट की और कहा, "भाभी, आप भी श्रद्धा और सबुरी से यह व्रत कीजिए। साईं बाबा पर भरोसा रखिए।"

सूरत लौटकर जेठ-जेठानी ने पूरे विधि-विधान से व्रत किया। कुछ समय बाद उनका पत्र आया। उसमें लिखा था कि बच्चों का मन अब पढ़ाई में लगने लगा है, वे रोज़ मन लगाकर पढ़ते हैं और इस बार परीक्षा में अच्छे अंकों से पास हुए हैं। उन्होंने यह भी लिखा कि उन्होंने व्रत की पुस्तकें अपने परिचितों को भी बाँटी हैं, ताकि और लोग भी इस व्रत के बारे में जान सकें।

और भी भक्तों के अनुभव

पुस्तिका में ऐसे और भी अनुभव बताए गए हैं। कहीं किसी सखी की बेटी के विवाह की बात बहुत समय से अटकी हुई थी, तो कहीं किसी परिवार में लंबे समय से बीमारी के कारण चिंता बनी हुई थी। कथा बताती है कि उन्होंने भी श्रद्धा से साईं बाबा का नौ गुरुवार का व्रत किया और उनके मन को धीरज मिला, उनकी कठिनाइयाँ धीरे-धीरे हल्की हुईं। भक्तों का विश्वास है कि जो सच्चे मन से साईं बाबा को पुकारता है, बाबा उसे कभी अकेला नहीं छोड़ते।

साईं बाबा ने अपने भक्तों को श्रद्धा और सबुरी का पाठ पढ़ाया। श्रद्धा यानी अटूट विश्वास और सबुरी यानी धैर्य। कोकिला बहन ने इन्हीं दोनों के सहारे व्रत किया और कठिन समय में भी आशा का दीपक बुझने नहीं दिया।

कथा का समापन

हे साईं बाबा, जैसे आपने कोकिला बहन और उनके परिवार पर कृपा की, उनके घर में शांति और सुख लौटाया, वैसे ही इस कथा को पढ़ने और सुनने वाले सभी भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखना। सबके मन में श्रद्धा और सबुरी देना, सबके घर में प्रेम और सद्भाव बनाए रखना।

बोलो श्री सच्चिदानंद सद्गुरु साईंनाथ महाराज की जय!

पूजा में कथा कैसे पढ़ें

कथा गुरुवार की पूजा का मुख्य भाग है। साईं बाबा का फोटो सजाने और पूजा करने के बाद, आरती से पहले कथा पढ़ी जाती है। पूजा का पूरा क्रम साईं बाबा व्रत विधि पेज पर दिया गया है; नीचे केवल कथा पढ़ने से जुड़ी बातें हैं। हर परिवार की परंपरा थोड़ी अलग होती है, इसलिए जहाँ अंतर हो, वहाँ अपने घर की रीति मानें।

  1. कथा शुरू करने से पहले घी का दीपक और धूप जलाएँ, पीले फूल और चंदन या कुमकुम का तिलक चढ़ाएँ और साईं बाबा को प्रणाम करें।
  2. बहुत से भक्त कथा पढ़ते या सुनते समय जुड़े हाथों में थोड़े अक्षत (साबुत चावल) और एक फूल रखते हैं और कथा पूरी होने पर उन्हें बाबा के चरणों में अर्पित कर देते हैं।
  3. कथा धीरे और साफ स्वर में पढ़ें। परिवार के लोग सुन रहे हों तो ऊँचे स्वर में, अकेले हों तो धीमे और शांत स्वर में।
  4. बीच में उठने या बात करने से बचें; मन कथा और बाबा में लगाए रखें।
  5. जो भाषा आप सबसे अच्छी तरह समझते हों, उसी में कथा पढ़ें। यही कथा अंग्रेज़ी में भी उपलब्ध है।
  6. कथा के बाद ॐ साईं राम या ॐ श्री साईं नाथाय नमः जैसा सरल मंत्र बोलें, फिर साईं बाबा की आरती गाएँ।
  7. प्रसाद चढ़ाएँ और उपस्थित सभी लोगों में बाँटें, क्योंकि बाबा को लोगों को भोजन कराना बहुत प्रिय था।

नौवें गुरुवार को भी कथा इसी तरह पढ़ी जाती है, फिर उद्यापन विधि के अंतर्गत गरीबों को भोजन कराया जाता है और व्रत की पुस्तकें भेंट की जाती हैं।

समापन प्रार्थना

आरती के बाद बहुत से भक्त अपने शब्दों में एक छोटी प्रार्थना करके पूजा पूरी करते हैं, जिसमें बाबा को धन्यवाद दिया जाता है और पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा माँगी जाती है। एक सरल प्रार्थना इस तरह हो सकती है:

हे साईं बाबा, मैंने अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार आपकी पूजा की है।
पूजा में जाने-अनजाने जो भूल हुई हो, उसे क्षमा करना।
मेरे मन में श्रद्धा और सबुरी बनाए रखना।
जैसे आपने कोकिला बहन पर कृपा की, वैसे ही सब भक्तों पर कृपा करना।
बोलो श्री सच्चिदानंद सद्गुरु साईंनाथ महाराज की जय।

आप अपने शब्दों में भी प्रार्थना कर सकते हैं। शब्दों से अधिक महत्व मन के भाव का है।